देवी प्रत्यंगिरा की एक चिंघाड़ से समाप्त हुआ भीषण युद्ध, जानिए क्यों लेना पड़ा था यह उग्र अवतार
हिंदू धर्मशास्त्रों में देवी-देवताओं के कई रहस्यमयी और अद्भुत अवतारों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं में से एक है देवी प्रत्यंगिरा, जो अपने उग्र रूप और दिव्य शक्ति के लिए जानी जाती हैं। कहा जाता है कि उनकी एक ही चिंघाड़ ने एक भयंकर युद्ध को समाप्त कर दिया था। आखिर क्यों लेना पड़ा देवी प्रत्यंगिरा को यह उग्र अवतार? आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा के बारे में।
शनिवार, 30 मार्च 2025
भगवान नरसिंह अवतार और युद्ध की पृष्ठभूमि
यह कथा भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से जुड़ी हुई है। जब भगवान नरसिंह ने अधर्मी राजा हिरण्यकश्यप का संहार किया, तब उनका क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनकी उग्रता से तीनों लोकों में भय फैल गया था। देवताओं और ऋषियों ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे इस स्थिति को नियंत्रित करें।
देवी प्रत्यंगिरा का अवतरण
भगवान शिव ने भगवान नरसिंह को शांत करने के लिए एक यज्ञ किया, जिससे देवी प्रत्यंगिरा प्रकट हुईं। देवी का स्वरूप अर्धसिंह और अर्धनारी का था, जो उनकी अद्वितीय शक्ति का प्रतीक था। जैसे ही उन्होंने अपनी महाचिंघाड़ की, चारों दिशाओं में ऊर्जा का संचार हुआ और भगवान नरसिंह का क्रोध शांत होने लगा।
एक ही चिंघाड़ से समाप्त हुआ भीषण युद्ध
देवी प्रत्यंगिरा की एक ही गर्जना से पूरे ब्रह्मांड में संतुलन स्थापित हो गया। कहा जाता है कि जहां उनकी शक्ति का संचार होता है, वहां किसी भी नकारात्मकता या अशुभता का स्थान नहीं रहता। उनके इस अवतरण से देवताओं ने राहत की सांस ली और सृष्टि में पुनः शांति स्थापित हो गई।
देवी प्रत्यंगिरा की पूजा और महत्व
आज भी देवी प्रत्यंगिरा की उपासना विशेष रूप से तांत्रिक साधना में की जाती है। माना जाता है कि उनकी साधना से व्यक्ति को हर प्रकार की नकारात्मक शक्तियों, शत्रुओं और भय से मुक्ति मिलती है।
देवी प्रत्यंगिरा का यह उग्र अवतार यह दर्शाता है कि जब भी अधर्म बढ़ता है, तब आदिशक्ति स्वयं प्रकट होकर संतुलन स्थापित करती हैं। उनकी पूजा विशेष रूप से संकटों से बचने और आत्मबल प्राप्त करने के लिए की जाती है।